कानपुर न्यूज डेस्क: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर में एक अनोखी खोज शुरू की गई है, जिसके कारण छात्रों का कक्षा में बार-बार उंघना बना। शुरुआत में इसे सामान्य माना गया, लेकिन जब खासकर सुबह की पहली कक्षा में कई छात्र लगातार उनींदे दिखने लगे, तो इसने प्रोफेसर का ध्यान खींचा। इसके बाद यह पता लगाने के लिए रिसर्च शुरू की गई कि क्या हॉस्टल में छात्रों का सोने का माहौल उनकी नींद की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहा है।
यह अध्ययन सिविल इंजीनियरिंग विभाग की प्रोफेसर डॉ. अनुभा गोयल की पहल पर शुरू हुआ। उन्होंने बताया कि भारत में नींद से जुड़ी ज्यादातर रिसर्च मेडिकल या मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर केंद्रित रही है, जबकि यह अध्ययन हॉस्टल के कमरों के डिजाइन, वेंटिलेशन, तापमान और आर्द्रता जैसे पर्यावरणीय प्रभावों का छात्रों की नींद पर असर समझने की कोशिश कर रहा है।
इस शोध की शुरुआत जिससे चार साल पहले किए गए एक और अध्ययन से हुई थी, जिसमें सालों के वेंटिलेशन की स्थिति का विश्लेषण किया गया था। वह अध्ययन में पाया गया कि खराब वेंटिलेशन वाली सालों में एक घंटे बाद छात्र ज्यादा थके और कम सतर्क महसूस करते थे। साथ ही कई छात्रों ने बताया कि वे क्लास शुरू होने से पहले ही थकान महसूस कर रहे थे, जिससे छात्रावास को संदेह हुआ कि समस्या हॉस्टल के कमरों से भी जुड़ी हो सकती है।
अध्ययन के पहले चरण में हॉस्टल में रहने वाले 500 से अधिक छात्रों का सर्वे किया गया, जिसमें पिट्सबर्ग स्लीप क्वालिटी इंडेक्स का इस्तेमाल कर उनकी नींद की गुणवत्ता मापी गई। सर्वे में छात्रों से कमरे के तापमान, आर्द्रता, वेंटिलेशन और खिड़कियां खुली या बंद रहने जैसे सवाल पूछे गए। यात्राओं में करीब 70 प्रतिशत छात्रों ने अपनी नींद की गुणवत्ता जुटाई नहीं बताई।
रिसर्च के दूसरे चरण में करीब 140 छात्रों के कमरों में सेंसर लगाए गए, जो तापमान, आर्द्रता और वेंटिलेशन का डेटा रिकॉर्ड कर रहे हैं। साथ ही छात्रों को स्मार्टवॉच दी गई हैं, जिससे उनकी नींद का पैमाना और अवधि दर्ज की जा सके। इस डेटा की मदद से वैज्ञानिक यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि कमरे का वातावरण नींद और एकाग्रता को किस तरह प्रभावित करता है।
इस प्रोजेक्ट में अंतरराष्ट्रीय सहयोग भी लिया गया है। पावेल वारगोकी, जो टेक्निकल यूनिवर्सिटी ऑफ डेनमार्क के विशेषज्ञ हैं, इस अध्ययन में सहयोग कर रहे हैं। हाथों का अध्ययन है कि यह भारत में अपनी तरह का पहला अध्ययन है और इसके निष्कर्ष भविष्य में छात्रावास और आवासीय छात्रावासों के बेहतर डिजाइन तैयार करने में मदद कर सकते हैं।